ब्रम्हास्त्र

एक मित्र ने यही मुझसे ब्रम्हास्त्र की फरमाइश की थी तो जी लीजिये जी पेश है

 

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए दिल बोला कि फिर वो समां चाहिए
वो बहती हवा वो गुज़रा ज़माना ये चाँद आज फिर से जवां चाहिए
तारे गिने अब ज़माना हुआ कोई छत को फिर से रोशन सा कर दे
वो किस्से वो गप्पें वो चाय के प्याले वो यारों की महफ़िल रवां चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

कि हो ऐसी बारिश कोई डर न हो जल्दी न हो और फिकर भी न हो
बरगद के आँचल में बैठे हों हम तुम बातों का कोई जिकर भी न हो
न शिकवा शिकन न कोई शिकायत बस आँखों से बातें बयां चाहिए
वो पगड़ी वो थैला वो रिक्शा वो तांगा घर में मुझे वो कुआं चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

मुझे चाहिए वो पायल की छम छम मुझे उसकी वो ही नज़र चाहिए
मुझे खिलखिलाहट वही चाहिए फिर से वो उसकी फिकर चाहिए
बहुत हो चुकीं ये बुतों की इबादत मुझे मेरा अपना खुदा चाहिए
बहुत मिल चुकीं ये झूठी तसल्ली सच्ची वो एक ही दुआ चाहिए

खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए

‪#‎विकास_भान्ती‬

 

साथ ही एक गुज़ारिश आप सबसे कि www.facebook.com/page1PL को लाइक करें और एक नई शुरुवात में भागीदार बनें

Previous Poem
Next Poem

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Hi, I am Vikas Bhanti. A Civil Engineer by proffession by poet by heart. Kindly like my page on FB and subscribe my YouTube channel for updates

7 Comments

  1. Panna - November 17, 2015, 2:31 am

    Bahut khoob….
    Vo San much he is brahmaastra me …
    Jo ek kavita me chaaiye

    • Vikas Bhanti - November 17, 2015, 7:01 am

      पन्ना भाई , ये तो बड़प्पन है आपका

  2. पंकजोम " प्रेम " - November 17, 2015, 8:20 am

    वापिस वही बचपन वाली चेहरे की मुस्कराहट , दिल को सुकून देती पायल की वो आहट ….
    खुशियों का हर एक लम्हा नया चाहिए…..

    खुद से जो पूछा क्या चाहिए…..

    बहुत ख़ूब ……..ब्रह्मास्त्र बड़े भाई ……

  3. Sumit Nanda - November 17, 2015, 1:01 pm

    कि हो ऐसी बारिश कोई डर न हो जल्दी न हो और फिकर भी न हो
    बरगद के आँचल में बैठे हों हम तुम बातों का कोई जिकर भी न हो…wah! padkar maja aa gaya

    • Vikas Bhanti - November 17, 2015, 1:03 pm

      Thank u sumit bhai

  4. Mohit Sharma - November 17, 2015, 11:23 pm

    हैरतंगेज कविता…घायल करती चली जा रही है

Comments are now closed on this post.