Vikas Bhanti

  • ठहरी हुई वो शाम ,
    हाथों पे स्याही से लिखा
    वो नाम

    चलती हुई सी वो सड़क
    साथ चलना बस यूँ ही
    हाथ उनका थाम

    मुस्कुराहटों में उनकी
    ढूंढना खुशियाँ दबी
    देखना कनखी से उनको
    और नजरे भर कभी

    धीरे धीरे पग बढाना
    रास्ता लम्बा […]

  • रोकर कोई न जंग जीता है न जीतेगा कभी ,
    वक्त है यह वक्त से पहले न बीतेगा कभी l
    हाथों में काले से बस कुछ दाग ही रह जायेंगे,
    हाथों से परछाइयों को जो घसीटेगा कभी ll

    -#विकास_भान्ती

  • एक मित्र ने यही मुझसे ब्रम्हास्त्र की फरमाइश की थी तो जी लीजिये जी पेश है

     

    खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए दिल बोला कि फिर वो समां चाहिए
    वो बहती हवा वो गुज़रा ज़माना ये चाँद आज फिर से जवां चाहिए
    तारे गिने अब ज़माना […]

  • I am Back on Saavan… 😀

  • रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
    दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
    सांझ घनेरी रात है काली […]

  • Vikas Bhanti changed their profile picture 4 years, 5 months ago

  • एक दफा बारिश का आनंद लेने की ठानी,
    यही कर दी हमने सबसे बड़ी नादानी |
    घर के बाहर ही कीचड का ढेर था ,
    और उस ढेर में फंसा मेरा पैर था |
    फिर भी मैंने हार ना मानी ,
    आगे बढ़ने की दिल में थी ठानी |
    शूकर पानी का […]

    • खुद के बंगले के आगे की सड़क तो पक्की करा ली ,
      और यह कह दिखा के उन्होंने शहर की तरक्की करा ली
      वाह क्या बात कह दी

  • क्यों नहीं कहता जो फ़साना है तेरा ये कैसा बेमान अफसाना है तेरा
    क्यों बना बैठा है वो बुत जो पूजा जाये ये किसकी परस्ती है की वो छा जाये
    क्यों नहीं तोड़ता तू ये तमाम बेड़ियांक्यों नहीं छोड़ता तू ये तमाम देहरियां
    तेरी […]

  • कर के दरकिनार फासलों को तू बढ़ता जा

    तू चढ़ता जा सीढियां वो तमाम

    जो हर पल गोल घूम जातीं हैं सताती हैं पर

    बताती हैं कि बढ़ना ही जिंदगी है चढ़ना ही जिंदगी है

    ‪#‎विकास_भान्ती‬

  • तुम साज़ बनो हम गीत बनेंगे ,
    तुम प्रिय बनो हम प्रीत बनेंगे |
    चल दो कुछ पग मेरे पथ पर
    तुम दौड़ बनो हम जीत बनेंगे |

    ‪#‎विकास_भान्ती‬

  • रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी |
    देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी ||

    काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं |
    दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं |
    सांझ घनेरी रात है क […]

  • बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या,

    कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
    खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
    जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है
    और खरीद लूँ वो खिलौने
    जिसमें लाखों कि खुशी रहती है
    खरीदना […]

    • कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ
      खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया
      वाह वाह

  • मिलती गर इज़ाज़त, थोड़ी सी मोहलत मांग लेता |
    पिंजरे की दाल छोड़कर, आसमानों की भांग लेता ||
    चल पड़ता जहाँ बढ़ते कदम, मुड़ता बस नज़र की ओर |
    उतार देता थैला काँधे से , नौकरी खूंटी पर टांग देता ||

    -‪#‎विकास_भान्ती‬