Vikas Bhanti, Author at Saavan's Posts

ठहरी हुई वो शाम

ठहरी हुई वो शाम , हाथों पे स्याही से लिखा वो नाम चलती हुई सी वो सड़क साथ चलना बस यूँ ही हाथ उनका थाम मुस्कुराहटों में उनकी ढूंढना खुशियाँ दबी देखना कनखी से उनको और नजरे भर कभी धीरे धीरे पग बढाना रास्ता लम्बा चले आँखों में भरने को उनको और ज्यादा शब मिले माँगना कुछ और घंटे माँगना मंदिर के आगे लम्बी कर दे शाम चलती हुई सी वो सड़क साथ चलना बस यूँ ही हाथ उनका थाम »

परछाइयां

रोकर कोई न जंग जीता है न जीतेगा कभी , वक्त है यह वक्त से पहले न बीतेगा कभी l हाथों में काले से बस कुछ दाग ही रह जायेंगे, हाथों से परछाइयों को जो घसीटेगा कभी ll -#विकास_भान्ती »

ब्रम्हास्त्र

एक मित्र ने यही मुझसे ब्रम्हास्त्र की फरमाइश की थी तो जी लीजिये जी पेश है   खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए दिल बोला कि फिर वो समां चाहिए वो बहती हवा वो गुज़रा ज़माना ये चाँद आज फिर से जवां चाहिए तारे गिने अब ज़माना हुआ कोई छत को फिर से रोशन सा कर दे वो किस्से वो गप्पें वो चाय के प्याले वो यारों की महफ़िल रवां चाहिए खुद से जो पूछा कि क्या चाहिए कि हो ऐसी बारिश कोई डर न हो जल्दी न हो और फिकर भी न हो ... »

Ram

रात घनी अंधेर बड़ी है, फिर से राम पधारो जी | देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी || काहू सो कहूँ ब्यथा अपनी मैं नित ही पंथ निहारूं | दनुजन को तुम त्रास दये नाम राम ही पुकारूं | सांझ घनेरी रात है काली भक्तन को उद्धारो जी | देव संत और मनुज उबारो, दुष्टन को संघारो जी || बड़ देवन के तुम काज संभारे आसिस दिए बड़े | देव दनुज गन्धर्व दूत सब तेरे द्वार खड़े|| दृष्टि धरो जगत धरा पर भक्तन को निहारो जी | द... »

बारिश

एक दफा बारिश का आनंद लेने की ठानी, यही कर दी हमने सबसे बड़ी नादानी | घर के बाहर ही कीचड का ढेर था , और उस ढेर में फंसा मेरा पैर था | फिर भी मैंने हार ना मानी , आगे बढ़ने की दिल में थी ठानी | शूकर पानी का आनंद ले रहे थे , जाने कैसे विचार मेरे मन में बह रहे थे | आगे बढ़ा तो कार वाले ने नहला दिया , मेरे कपड़ो पर कीचड ही कीचड फैला दिया | यह सब तो मेरे लिए आम था , क्योंकि मैं एक आम इंसान था | सड़क पर ही ताल... »

4 Liner#4

क्यों नहीं कहता जो फ़साना है तेरा ये कैसा बेमान अफसाना है तेरा क्यों बना बैठा है वो बुत जो पूजा जाये ये किसकी परस्ती है की वो छा जाये क्यों नहीं तोड़ता तू ये तमाम बेड़ियांक्यों नहीं छोड़ता तू ये तमाम देहरियां तेरी बेईमानी तेरा इमान क्यों है ऐ दिल, तू इतना बेजुबान क्यों है –‪#‎विकास_भान्ती‬ »

4 liner#3

कम शब्दों में ज्यादा बात »

4 Liner#2

4 पंक्तियाँ :दिल से ... »

फिर से राम

A trial witrh Awadhi Language »

अनकही सी एक बात

बिन माँ और पिता का एक बच्चा इसके सिवा सोचेगा भी तो क्या, कोई बेचे तो मैं हँसी खरीद लूँ खरीद लूँ वो गुड्डे गुड़िया जिनकी बंद आँखे भी हँसी देती है और खरीद लूँ वो खिलौने जिसमें लाखों कि खुशी रहती है खरीदना है मुझे आँचल वो माँ का जिसके पहलू में कभी धूप नही लगती कहाँ पाऊँ मैं जिगर बाप का जिसके साये में कभी भूख न बिलखती ऐसी कश्ती से मेरा सामना हर बार हो गया है कितनी तेजी से ये शहर भी बाज़ार हो गया है R... »

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