मन ही मन पछताऊँ
पल-पल, छिन्न-भिन्न टूट रहा भ्रम ,
अपनी छाया ढूँढ़ रहा मन,
अब तक निज पद- चापो में,
तेरी छाया देख रही थी,
स्व अरमानों की वो माला,
तेरे धागे में पिरो चली थी,
दिल के साज़ो को भी,
मैंने तेरे ही लय में ढाला,
माँग रहा मन मुझसे,
आज निज अरमानों की वह माला ,
मैंने तो अपनी हस्ती को भी,
तेरी कश्ती में दे डाला,
अपने जीवन का खाँका,
क्यूँ मैंने तेरे पैमाने में ढाला,
अनुचित किया मैंने क्या,
जो निज अंतस में तेरी दीप जलाई,
अँधियारा घनघोर मनस का,
कैसे अब मिटाऊँ,
अपने दिल के घावो को,
कैसे मैं सहलाऊँ,
अपनी हस्ती को गवाँ कर,
अब मैं बहुत पछताऊँ,
अरमानों के अनमोल पहर को,
ढूँढे ढूँढ़ न पाऊँ,
जीवन की चक्की में,
स्व अरमानों को पिसता पाऊँ,
मन ही मन पछताऊँ,
मन ही मन पछताऊँ ।।
शब्दों को तराश कर क्या रूप दिया है कि भाव पारदर्शी हो गये है…उम्दा काव्य
बहुत शुक्रिया panna ji