Ritu Soni's Posts

जीवन से हम क्या लिए

जद्दोजहद में जीवन के अनमोल लम्हेरुठते चले गए, और मैं बेखबर मोहरों के चाल में उलझी, पढ़ाव दर पढ़ाव उलझती चली गयी, जीत -हार से क्या मिले, चाहे जितनी शीतल बयार चले, एक झोंका गर रूह को न छुए, तो जीवन से हम क्या लिए। दाँव दर दाँव चले, हार-जीत बीच जीवन से सिर्फ शिकवे-गिले किये, जीवन के खेल में जब अंतिम पढ़ाव से जा मिले, सब मोहरे गिरे पड़े, जीवन से हम क्या लिए। एकाकी मैं से तब मिले, जब स्याह अँधेरी रात भयी, ... »

तकनीकी की लय

तकनीकी की लय में रिश्ते अब ढल रहें हैं , पीर की नीर हो अधीर जल धारा बन बह रही है, मन्तव्य क्या, गन्तव्य क्या, भावनाओ की तरंगे सागर की लहरो सी, विक्षिप्त क्रंदन कर रही हैं। तकनीकी की प्रवाह में संवेदनाएं ढल रहीं है, मौन प्रकृति के मन को जो टटोल सकें वो मानस कहाँ बन रहें हैं, आधुनिकता की होड़ में नव कल से मानव ढल रहे हैं, शुष्क मन संवेदनहीन जन कल से यूँँ हीं चल रहें हैं, तकनीकी के लय में कल से जीवन ढ... »

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

भारत को स्वच्छ बनाना है

चलो उठो ये प्रण कर लें हम भारत को स्वच्छ बनाना है, धरती माँ के आँचल को हरियाले,फल-फूलों से सजाना है, प्रदूषण की जहरीली हवा से पर्यावरण को मुक्त बनाना है, तन स्वच्छ तो करते सब हैं मन को स्वच्छ बनाना है। चलो उठो ये प्रण कर लें हम भारत को स्वच्छ बनाना है, इस धरा के कण -कण में नव जीवन का संचार है, व्यर्थ नहीं कुछ इस जगत में, कचरे को भी नयी पहचान दें, पुनः नया कर उसके भी अस्तित्व को सम्मानदें। चलो उठो ... »

जीवन

सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, ये जो है झीनी चादर जिंदगानी हमने- तुमने मिल बुनी है, रेशे-रेशे में घुली है तेरे-मेरे जज़्बातों की जवानी। सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, चांदनी रातों के परों पर कितने अरमां की निशानी, ले उड़ी उन फलों की मीठी-मीठी सी कहानी। सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, चादर के हम छोरों को पकड़े वक्त के मोड़ों में जकड़े, सिलवटों से कितने सपने ढों रहे हम अ... »

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की अरुणिम उषा में, राजपत की छवि निराली , हर रंगों की वेशभूषा में , भारत माता की छवि है प्यारी , उस पर तिरंगे का नील गगन में लहराना , जय हिन्द .जय भारती की, स्वरलहरी से गुंजित दिशाएं , हर जन के मन में, भारतवासी होने का अभिमान जगाए। भारत माँ के हर अंगों की, छटा बड़ी मनोहारी है, रंग – बिरंगे फूलों के अलंकार ने, अद्धभुत छटा बनाई है। भारत की सुंदरता गणतंत्र की , प्रजातंत्र में समायी ह... »

नव

नव

नभ के अरुण कपोलों पर, नव आशा की मुस्कान लिए, आती उषाकाल नव जीवन की प्यास लिए, दिनकर की अरुणिम किरणों का आलिंगन कर, पुष्प दल मदमस्त हुए,डोल रहे भौंरे अपनी मस्ती में, मकरन्द का आनंद लिए, नदियों के सूने अधरों पर ,चंचल किरणें भर रहीं , नव आकांक्षाओं का कोलाहल, जीव सहज हीं नित्य नवीन​ आशाओं के पंख लगाकर भरते उन्मुक्त गगन में स्वपनों की उड़ाने, नये-नये नजरिए से भरते जीवन में नव उन्माद सारे , चकित और कोर... »

नया साल

नया साल

पल महीने दिन यूँ गुजरे, कितने सुबह और साँझ के पहरे , कितनी रातें उन्नीदीं सी, चाँदनी रात की ध्वलित किरणें, कितने सपने बिखरे-बिखरे, सिमटी-सिमटी धुँधली यादें, कुछ कर जाती हैं आघाते , कभी सहला ,कर जातीं मीठी बातें, हौले-हौले साल यूँ गुजरा, जाते-जाते रूला गया, नये साल की नयी सुबह से, दामन अपना छुड़ा गया, कितने सपने दिखा गया । नये साल की नयी सुबह के , दहलीज पर आ गए हम, अनगिनत उम्मिदें बाँध खड़े हम, कित... »

स्पर्श

जीवन की पथरीली राहों पर, जब चलते-चलते थक जाऊँ, पग भटके और घबराऊँ मैं, तब करुणामयी माँ के आँचल सा स्पर्श देना, ऐ ईश मेरे । जब निराश हो, किसी मोड़ पर रूक जाऊँ, हताश हो, कुण्ठाओं के जाल से, न निकल पाऊँ मैं, तब सूर्य की सतरंगी किरणों सा, स्फूर्तिवान स्पर्श दे, श्री उमंग जगा देना, ऐ ईश मेरे। जब चंचल मन के अधीन हो, अनंत अभिलाषाओं के क्षितिज में, भ्रमण कर भरमाऊँ मैं, तब गुरु सम निश्छल ज्ञान का स्पर्श देन... »

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अब

अब ममता की छांँव और आत्मीयता को छोड़, व्यवसायिक मुकाम हासिल करने में जुटी जिंदगी । अब कुदरती हवा और चाँदनी रात के नज़ारों को भूल, वातानुकूलित कमरे और दूरभाष में जुटी जिंदगी । अब आधुनिकता की जद्दोजहद में खुशी-ग़म बाँटना भूल, अपने आप में सिमटती जिंदगी । अब भीतर से खोखली होती, दिखावटी मुखौटों से सुसज्जित होती जिंदगी। अब वात्सल्य, स्नेह, प्रेम बंधनों को तोड़, खुदगर्ज होती जिंदगी । अब मानसिक असंतुलन के... »

क्या-क्या छुपा रही थी

न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, गर्मी की सुबह, वो शाल ओढ़े जा रही थी, धूल से पाँव सने थे,चंचल नयन बोझिल हुए थे, भूख से पेट धँसे थे,चकित हो मैं देख रही थी, मन ही मन ये पूछ रही थी, क्या यह ठंड से बचने की जुगत है या, तन ढकने को वो विवश है, कैसा अपना ये सभ्य समाज है, कोई नित्य नये परिधान बदलते, कुछ लोग वहीं टुकड़ो में ही पलते। न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, तन पर कितने गर्द पड़े थे, उसको इसकी कहांँ फिकर ... »

क्या-क्या छुपा रही थी

न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, गर्मी की सुबह, वो शाल ओढ़े जा रही थी, धूल से पाँव सने थे,चंचल नयन बोझिल हुए थे, भूख से पेट धँसे थे,चकित हो मैं देख रही थी, मन ही मन ये पूछ रही थी, क्या यह ठंड से बचने की जुगत है या, तन ढकने को वो विवश है, कैसा अपना ये सभ्य समाज है, कोई नित्य नये परिधान बदलते, कुछ लोग वहीं टुकड़ो में ही पलते। न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, तन पर कितने गर्द पड़े थे, उसको इसकी कहांँ फिकर ... »

ग्रीष्म ऋतु

ग्रीष्म ऋतु की खड़ी दोपहरी, सुबह से लेकर शाम की प्रहरी, सूरज की प्रचंड किरणें, धरती को तपा रहीं हैं, फसलों को पका रहीं हैं ं, गुलमोहर की शोभा निराली, आम, लीची के बाग-बगीचे​, खग-विहग हैं उनके पीछे, माली काका गुलेल को ताने, करते बागो की रखवाली, कोयल की कूक सुहानी, कानों में रस है घोलती, गर्म हवाएंँ ,धूल और आँधी, ग्रीष्म ऋतु की हैं  ं साथी, ताल-तलैया सूख रहें हैं, बारिश की बूंँदों की आस में, जल वाष्प... »

हँस लिया करो

हँस लिया करो

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2017/04/06 कभी यूँ हीं हँस लिया करो, उदासी का दामन छोड़, खुशियों से मिल भी लिया करो, बहुत छोटी है जिन्दगी, जीने की तमन्ना बुन भी लिया करो। कभी यूँ हीं हँस लिया करो, गुम-सुम रहना, पल-पल सहेजे, जज्बातों में बहना, ठीक नहीं है इन हालातों में रहना । कभी यूँ हीं हँस लिया करो, ख्वाबों के पंख उतार, हकीकत की जमीन पर चल लिया करो, माना पथरीली है जमीन, पर राहों की दु... »

Martyr’s Day Contest: Reply to Saavan team’s request

Dear All, This is in reply to Saavan team’s request to share the ways I used for promotions of my poem for Martyr’s Day Contest.  It was a joint effort of me, my daughter and my younger brother. I run a personal blog by the name – Jeevan Dhara, which has an active viewership of 5k people and also, I am an active contributor to various fb poetry pages. For the contest, I tried to ... »

वो माटी के लाल

वो माटी के लाल

वो माटी के लाल हमारे, जिनके फौलादी सीने थे, अडिग  इरादो ने जिनके, आजादी के सपने बूने थे, हाहाकार करती मानवता, जूल्मो-सितम से आतंकित थी जनता, भारत माता की परतंत्रता ने उनको झकझोरा था, हँसते-हँसते फाँसी के फँदे को उन्होंने चूमा था, वो माटी के लाल हमारे, राजगुरू, सुखदेव,भगतसिंह , जैसे वीर निराले थे , धधक रही थी उनके, रग-रग में स्वतंत्रता बन कर लहू, वो दीवाने थे, मतवाले थे, भारत माता के, आजादी के परवा... »

संसार के बाजार में दहेज

संसार के बाजार में दहेज

इस जहांँ के हाट में , हर  चीज की बोली लगती है, जीव, निर्जीव क्या काल्पनिक, चीजें भी बिकती हैं, जो मिल न सके वही , चीज लुभावनी लगती है, पहुँच से हो बाहर तो, चोर बाजारी चलती है, हो जिस्म का व्यापार या, दहेज लोभ में नारी पर अत्याचार, धन पाने की चाहे में, करता इन्सान संसार के बाजार में, सभी हदों को पार, दहेज प्रथा ने बनाया, नारी जहांँ में मोल-भाव की चीज, ढूँढ रही नारी सदियों से, अपनी अस्तित्व की थाह, ... »

आओ तन मन रंग लें

आओ तन मन रंग लें

चली बसंती हवाएँ , अल्हड़ फागुन संग, गुनगुनी धूप होने लगी अब गर्म, टेसू ,पलाश फूले, आम्र मंज्जरीयों से बाग हुए सजीले, तितली भौंरे कर रहे , फूलो के अब फेरे , चहुंँ दिशाओं में फैल रही, फागुन की तरूणाई, आओ तन मन रंग लें, हम मानवता के रंग , भेद-भाव सब भूल कर, आओ खेलें रंगों का ये खेल , प्रेम , सौहार्द के भावों से, हो जाए एक-दूजे का मेल, होली पर्व नहीं बस रंगो का खेल, प्रेम , सौहार्द के भावों का है ये म... »

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान

सूखी धरती सूना आसमान, सूने-सूने किसानों के  अरमान, सूख गयी है डाली-डाली , खेतों में नहीं  हरियाली, खग-विहग या  हो माली, कर रहे घरों  को खाली, अन्नदाता किसान हमारा, खेत-खलियान है उसका सहारा, मूक खड़ा  ये  सोच रहा है, काश  आँखों में हो  इतना पानी, धरा को दे  देदूँ मैं हरियाली, अपलक आसमान निहार, बरखा की करे गुहार, आ जा काले बादल आ, बरखा रानी की पड़े फुहार, धरती मांँ का हो ऋंगार, हम मानव हैं बहुत नादा... »

ढ़ूँढ रही मैं

ढ़ूँढ रही मैं बावरी, अपने हिस्से का, स्वर्णिम आकाश, टिम-टिम करते तारे, हाय! सुख-दुख के, बन गए पर्याय , तम घनेरा ऐसे , छाय जैसे चन्द्र में ग्रहण लग जाए, मौसम आए मौसम जाए, कभी न सरसो फूली हाय! हरियाली की एक नज़र को, तमन्नाएँ तरसती रह जाएँ, झूम कर बारिश की आशाएँ, बादल गरजें और बूँद-बूँद, गिर कर रह जाए, एक बूँद भी अगर, मिल जाए,समझो, जीवन तृप्त हो जाए, ख्यालों के विस्तृत , दायरे में ढ़ूँढू अपना , परिचय... »

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के

बच्चे हम फूटपाथ के, दो रोटी के वास्ते, ईटे -पत्थर  तलाशते, तन उघरा मन  बिखरा है, बचपन  अपना   उजड़ा है, खेल-खिलौने हैं हमसे दूर, भोला-भाला  बचपन अपना, मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे, लगते बहुत लुभावने , पर बच्चे हम फूटपाथ के, ये चीजें नहीं हमारे  वास्ते, मन हमारा मानव का है, पर पशुओं सा हम उसे पालते, कूड़ा-करकट के बीच, कोई मीठी गोली तलाशते, सर्दी-गर्मी और बरसात, करते हम पर... »

जगह अपनी बनानी पड़ती हैं

इस जीवन नाटक में, जगह अपनी बनानी पड़ती है, अस्तित्व अपनी मनवानी पड़ती है, कितना हीं गुणवान हो कोई, लोगों की नजर में हुनर अपनी, आजमावानी पड़ती है, गहने बनने को जैसे, सोने को तपना पड़ता है, तारे को अस्तित्व मनवाने को, चमकना  पड़ता है, कोरे सच्चे होने का, दिल के अच्छे होने का मूल्य नहीं है, नाटक में जगह पाने को, अपनी कला दिखानी पड़ती है, जीवन जीने की होड़ में, खुद की बोली लगानी पड़ती है, नाटक में अपन... »

आँसू

इस हृदय क्षितिज के, शून्य तल पर काली घटाएं, हैं जब-जब छातीं , हृदय पटल को विदीर्ण कर, वेदना ऐसे अकुलाती, जैसे काली घटाओं बीच, दामिनी  है कड़कड़ाती, अविरल बरसती  नयनो के, बाँध तोड़  जाती । हृदय क्षितिज के शून्य, पटल पर व्यथा कथा, की भूली बिसरी यादें, ऐसे फिर-फिर आती, जैसे चट्टानों के बीच, ध्वनि है खुद को दोहराती । सागर के अन्तर में जैसे, है द्रवित पलों की ज्वार भाटा, विह्वल  लहरों का है कोलाहल, ऐसे... »

माँ हूँ मैं

ममता की छाँव तले , समता का भाव लिए, इंसानियत का सभी में, संचार चाहती हूँ, माँ हूँ मैं,हाँ भारत माँ, एकता और सदभाव का, प्रवाह चाहती हूँ । माँ हूँ मैं,हाँ प्रकृति माँ, संरक्षण की चाह है, जो भी है अपनी संपदा, जल, वायु, धरा का, सभी में समान रूप से, सदुपयोग चाहती हूँ जीवन संरक्षण करने में, सभी का सहयोग चाहती हूँ । माँ हूँ मैं,हाँ देवी माँ, सुख समृद्धी का आशीर्वाद, लुटाती हूँ,करबद्ध प्रार्थना न, फल-फूल ... »

जीना इसे कहते हैं

जिसे हम जीना कहते हैं, वो पल-पल मरना है जानो, निज हित में रत रहना, खाना, सोना , जगना ये, जीना नहीं है मानो । सृष्टि की श्रेष्टतम रचना का, मूल्य तो तुम अॉको, जग हित में जो अपना, तन-मन अर्पण कर दे, प्राणियों के हित में, जीवन समर्पण कर दे, नई डगर मानव के , हित गढ़ दे,सूने जीवन में, किसी के आशाएँ भर दे, जीना इसे हीं कहते हैं। जो न कुछ कर पाओ, तो तुम सदभावना तो बाँटो, अहिंसा के पथ पर चल कर, लाचारो के द... »

शाखों के पीले पत्ते

शाखों के हरियाले पत्ते, जो हैं आज पीत हुए, शीत-ग्रीष्म सहते -सहते, बदरंग और अतीत हुए, उन पतझड़ के नीरस , पत्तो में भी था आस कभी, जिन शबनमी अश्को का, नयनो में था आवास कभी, बिखर चुके हैं सूख गए हैं, हाँ उन पर भी था नाज़ कभी, जिन स्मृतियो से हो जाते हैं, सजल नयन अभी,उनमें भी, सजते थे सपने,जगते थे प्यास कभी , जिन स्वरो की मादकता का, होता नहीं आभास अभी, देती थी वो व्याकुल मन को, रसमय संगीत का आभास कभी,... »

सदा के हो चले

खुदी को मिटा कर, रम जाऊँ जहाँ में, खूशबू बन कर, समा जाऊँ फिज़ा में, कि सदा बन कर, बस जाऊँ आहो में, खुशी और गम़ का, सहारा न रहा, साहिल का साथ, अब गवारा न रहा, कि विशाल क्षितिज का, किनारा न रहा, आशा-निराशा  अब, हमारे   न.  रहे , हम हैं सभी के, सब हमारे हो रहे, जन्म -जन्मान्तर के, फलसफे फसाने हो चले, हम सदा से रहे, सदा के हो चले, हम खुदी को मिटा कर, खूशबू बन फिज़ा के हो चले ।। »

परिहास बनी

परिहास बनी पल दो पल के, उन्मादित पलों को, प्रेम समझ परिहास बनी, कोमल एहसासों को अपने, पाषाण में तराश  रही, क्षणभंगुर जगत में, अमरता मैं तलाश रही, प्रेम -विरह की पीड़ा, जीवन में अवसाद बनी, कुसुमित एहसासों के पल, है मुझ पर अब भार बनी, सोते -जगते नयनो में, सपने जो जगमग दिन-रात करें, जुगनू बन भ्रमण करें, अब उनका रस्ता मैं ताक रही, छिन्न हुए हालातों को, कब से हँस-हँस कर, मैं  टाल  रही, अवसादो से भरे पल... »

अपना क्या है

जीवन में अपना क्या है, एहसासों का सपना जो है, खट्टी-मीठी यादों की जाल, और कुछ सुनहरे भविष्य की आस, मन में संजोए जीने की प्यास, बुनते हम नित्य नए अरमानों के जाल , जीवन में अपना क्या है, सोते -जगते सपनो की खान, नित्य कर्मों में भरते प्राण. , अरमानों की हवाई उड़ान, बनी रहे ज़ज्बातों की शान, जीवन में अपना क्या है, चंद साँसो में उलझी जान, बुझी-अनबुझी सी प्यास, ख्यालों के भँवर में रमती, बनती- बिगड़ती  आ... »

विचारों को जब

विचारों को जब बाँध रही थी, अरमानों के साँचे ढाल रही थी, खिन्न हुई, उद्वगिन हुई  जब, खुद को मैं आँक रही थी । विचारों को खोल  चली जब, निरन्तर  प्रवाह से जोड़ चली जब, आशा-निराशा  छोड़ चली जब, जीवन संग आन्नदित हूँ। कर्तव्यो की जो होली है, रंग-बिरंगी  आँख मिचोली है, संग मैं हूँ, जीवन की जो भी बोली है ।। https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/10/15/   »

एक रस होने की आस

वो पूर्ण शक्ति जब बिखर गया, कण-कण में  सिमट गया , तब हुआ इस जग का निर्माण, वो परमपिता सृजनकर्ता जो, नित्य सूर्य बन अपनी किरणो से, नव स्फूर्ति का जीवो में करता संचार, वो ममतामयी चाँद की चाँदनी बन, स्नेहिल शीतलता का आँचल फैलाए, हम जीवो को सहलाता, टिम-टिम तारो के मंद प्रकाश में, नयनो में निद्रा बन समाता, खुली नयनो के अनदेखे सपने, ले आगोश में हमें दिखाता, पूर्ण प्रेम जो कण-कण में बिखरा, एक रस होने की ... »

उठो वीर जवानो

उठो वीर जवानो भारत माता, तुम्हे पुकार रही, अपने लालों के लहू का, बदला माँग रही, अपने अमर जवानो के पथ पर, चलने को ललकार रही, उठो वीर जवानो भारत माता, तुम्हे पुकार रही, आज फिर भारत माता , पर आघात हुआ, देश के हुकूमरानो की, विफलता का आभास हुआ, आतंक और दंगा अब आम हुआ, उठो वीर जवानो भारत माता, तुम्हे पुकार रही, चण्ड बनो,दबंग बनो, साहस और उमंग भरो, देश के गद्दारों का,आतंकियो का, हत्यारों का दम्भ तुम भंग ... »

काल चक्र

काल चक्र में घूम रही, मैं कोना-कोना छान रही, हीरा पत्थर छाँट रही मैं, तिनका-तिनका जोड़ रही, उसमें भी कुछ हेर रही, संजोऊँ क्या मैं भरमाऊँ, कण-कण में फँसती जाऊँ, इस  क्षण  में. डूबूँ या स्वपनिल, चमन में  मैं  उड़  जाऊँ, चरखा डोर पतंग हुआ मन, इस क्षण बाँधूू चरखे से डोर, सरपट दौड़े मन पतंग की ओर, डोर से पतंग जोड़ने की होड़, बिन डोर पतंग उड़े उन्मुक्त, चमन की ओर,चरखे पतंग में, डोल. रहा मन , डोर निरा, व... »

अभेद में भेद

किसने  मानव  को  सिखाया, करना  अभेद  में   भेद। एक  निराकार  परमात्मा, अनन्त, अविनाशी, अभेद, हम  मानव  झगड़  रहे , कर  उसके  भेद। एक  हीं  जमीं  एक  आसमां, एक  हीं  सूरज- चाँद, फिर  क्यूँ  मानव  झगड़  रहा, खुद  को  सीमाओं  में  बाँध। कैसा  देश  कैसा  विदेश, एक  हीं  तो  है, हमारा    परिवेश । क्या  मानव  रखेगा , अब   धूप- छाँव  का, भी  बहिखाता  सहेज। एक  सी  मानव  संरचना, धमनियों  में  संचारित, रक्... »

चिर आनन्द की अभिलाषा

चिर आनन्द की अभिलाषा में, चंचल मन व्याकुल रहता है, अंधियारे-उजियारे में, कुन्ज गली के बाड़े में, देवालय में,जीव-निर्जिव सारे में, ढूँढ़़-ढूँढ़ थक हारी मैं, इस जग की सारी कृति, कराहती  पुकारती आनन्द की, चाह में धून अपनी सँवारती, व्याकुल मन पल-पल गढ़े, सपनो के ताने-बाने बुने, नदिया भी व्याकुल कल-कल करे, हवा भी सन-सन करे, जीव सारे कर्मों में  लगे, आनन्द  कैसे  कहाँ  मिले, सोच-सोच कर हारी मैं, सुना हर... »

जाने किस कशमकश में

जाने किस कश्मकश में, जिंदगी गुजरती जा रही है, न जाने मैं अपना न पाई या, जिंदगी मुझे आजमाती रही, बहुत हीं कच्ची डोर में, ये पतंग फँसी हुई है, न जाने किस गुमाँ में, उड़ती चली जा रही है, नादान है जिन्दगी या, मुझे कुछ समझा रही है , न जाने क्यूँ मुझ पर , इतना हक जता रही है, जिंदगी तेरी पाठशाला मुझे, उलझाती जा रही है, बस यूँ हीं तुझे समझते, कुछ कहते सुनते, ये उम्र चली जा रही है, यूँ तो तुझसे कोई शिकवा, ... »

मदहोश हम

मदहोशी में जीवन कारवाँ, चला जा रहा है, लड़खड़ाते कदम,ठिठक जाते कदम, दिशाहीन मन,बिना पंख, उड़े जा रहे हैं, ख्वाबो के अधीन हम, हैरान हैं,  परेशान हैं , मन्तव्य क्या, मन्तव्य क्या, बस यूँ हीं बढ़े जा रहे हैं, कौन हैं, क्या हैं, हम कौन,तुम क्या, मदहोशी के आलम में, समय में घुले जा रहे हैं, रफ्ता-रफ्ता धुआँ बन, उड़े जा रहे हैं, खुश हैं कि हम तो, जीए जा रहे हैं, जिंदगी से हम ठगे जा रहे हैं, बेहोश हैं क्य... »

अभी बाकी है

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/08/12 जीने की लय में, अभी सरगम बाकी है, बारिशो के बाद, इन्द्रधनुषी छटा आती है, चकाचौंध रोशनी न सही, अभी झरोखों से किरण आती है, जिंदगी कहीं न कहीं , अभी बाकी है । चरमराई सी चारपाई में, अभी दम बाकी है, दो पहर न सही, रात में नींद तो आती है , जिंदगी कहीं न कहीं , अभी बाकी है । बसंती हवा न सही, पतझड़ की बयार तो आती है, नव जीवन की आस , अभी बाकी है । सरपट र... »

बनते बिखरते क्रम

जीवन चक्र के बनते बिखरते क्रम में, कितने पल हम मिल-बाँट जीए, कुछ छिछले बर्तन सम, द्रवित पल न थाम सके, कितने मोती सम पल, समय की धार में फिसल गए, कितनी रातें सहमी -सहमी, नीरस दिन यूँ  निकल गए, कितने पल छलते जीवन के, समय के गर्त में समा गए घनघोर काली बदली झम-झम बरसे , जैसे हो विहवल ऐसे ही , अवसाद के कुछ पल, निर्झर बन रमते मन में , पल-पल जीने-मरने के क्रम से, मन को मैंने अब आज़ाद किया, किसने किसकी साँ... »

हाँ रहने दो

भ्रांति की अविरल धारा बहने दो, जिजीविषा काया की रहने दो, खंडित जीवन की अभिलाषा, जो कुछ शेष है  सहने. दो, हाँ, रहने दो,कुंठित मन की कामना, हास-परिहास की भावना, जीवन चक्र की सतत प्रताड़ना, मृगतृषित  मन को सहने दो, हाँ, रहने दो ,इस क्षण में, जीने  की  लालसा, विचलित मन की साधना, आकांक्षाअो  की आराधना, जो कुछ शेष है,रहने दो, हाँ, रहने दो, भ्रांति की, अविरल धारा बहने दो ।। https://ritusoni70ritusoni70.w... »

मन में

बिन मौसम बरसात  हो, जब बिन मेघ वज्रपात, होता है तब मन में , पत्र  विहिन  वृक्ष के , दुुखो. का  एहसास । जब निर्विकार मन में , बोता है कोई विकृत बीज, आहत हो जाते हैं सपने, निज अपनो से भयभीत । जब हर्षोल्लास की दुनिया से, रहे  न  कोई  प्रीत, पग की ठोकरो से , न हो मन भयभीत , तब कोई मीरा बन , कान्हा से करे प्रीत । जब कभी एकान्त में , अन्तर्द्वन्द से मन जाय जीत, तब कहीं शांत मन में , बनता  अपना तस्वीर । ... »

कच्ची मिट्टी के हम पुतले

कच्ची मिट्टी के हम पुतले, तपे गर जीवन भट्टी में, तो  जगतहार  बने, जैसे  सोना तप भट्टी में , अलंकार.  बने , कच्ची मिट्टी के हम पुतले, अपनी. किस्मत आप गढ़े, जैसे बरखा की कोई बूँद, सीप में गिर मोती बने, कच्ची मिट्टी के हम पुतले, तपे न गर जीवन में, तो फिर बेकार जीए, बनते-मिटते ये जीवन क्या, कितने ही जन्मो का चक्र, हमने  पार. किए, जैसे गीली मिट्टी चाक पर, फीर- फीर  हर बार, बने, हर बार मिटे । https://ri... »

तुम्हे है दूर जाना

उठो पथिक तुम्हे है दूर जाना, नदिया, सागर, पर्वत के पार जाना, ऊँची-नीची  डगर से मत घबराना । कितने ही चट्टान हो पथ में, लहरो ने है कब हार माना, बढ़ाते जाना और बढ़ते ही जाना, जीवन जीना उसी ने जाना । अँधियारे पथ में है दीपक जलाना, बंजर भूमि में है फूल उगाना , तूफानो का है सागर में आना-जाना, नाविक ने कब है हार माना । जब ठान लिया कुछ करना है, सोना से कुन्दन बनना है, फिर तपने से क्या डरना, गन्तव्य पथ की ... »

मन में

बिन मौसम बरसात  हो, जब बिन मेघ वज्रपात, होता है तब मन में , पत्र  विहिन  वृक्ष के , दुुखो. का  एहसास । जब निर्विकार मन में , बोता है कोई विकृत बीज, आहत हो जाते हैं सपने, निज अपनो से भयभीत । जब हर्षोल्लास की दुनिया से, रहे  न  कोई  प्रीत, पग की ठोकरो से , न हो मन भयभीत , तब कोई मीरा बन , कान्हा से करे प्रीत । जब कभी एकान्त में , अन्तर्द्वन्द से मन जाय जीत, तब कहीं शांत मन में , बनता  अपना तस्वीर । ... »

अनछुए पल

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/07/04 वो   अनछुए   पल, जिनको मैंने जिया नहीं, उन्मुक्त जीवन की छटा थी, या  कि  नव  सृजन. की कपोल. कल्पित परिकल्पना । जो  भी  थी  मुमक्षा, विलय  होने  की , उनमें समा जीने की, सुगंध   का  फूलों में, होना  बयाँ. करती थी । उन पलो में जीने की, ललक  इतनी  थी कि, ऊँची-नीची डगर की, समझ  कितनी. थी । उनमें  परियों की कथा थी, कि सतरंगी जीवन जीने की, अदा  थी जो ... »

जो तुम मेरे होते

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/06/28 जो तुम मेरे होते , निरिह विरह में व्याकुल मन से, मेरे  चित की सुन्दरता जान लेते, मन्त्र-मुग्ध मन में मेरे , अपनी धुन पहचान लेते, जो तुम मेरे होते, लोलुप मन विचलित न होता, तुम नीर बिन मीन की, पीड़ा जान लेते , पूर्ण चन्द्र का, चाँदनी को समेट लेने की तन्मयता, स्पंदित हृदय का धड़कनो में समन्व्यता, जान लेते तुम,जान लेते, लय का सरगम बनने की आतुरता, ज... »

अश्को की शबनमी लड़ी

दृग कोमल ढूँढ़ रहे, अश्को की शबनमी लड़ी, भावनाओं में जो बसती, सुख -दुख में बूँद-बूँद बरसती। सागर में जा मिली या, कि सीप में मोती बनी, आह! मैं तो नहीं पी रही, घूँट- घूँट  घुटन भरी । भावनाओं की उथल- पुथल, कहाँ गयी सुख-दुख की कोलाहल, बोझिल पलकें हो चली, नज़रे फिर भी शुष्क पड़ी । दिल का दरिया सूख चला, सुख -दुख अब कैसे पलें, करूण क्रंदन गरजते बादल, सम हुए,बरसते-बरसते रूक पड़े । दृग कोमल ढूँढ़ रहे , अश्... »

आ जाओ

मलय पवन बन, आ जाओ मन उपवन में, सजल नयन है,झील कमल है, लोक-परलोक का कौतूहल, है निज चितवन में । प्रखर  सूर्य  बन , आ जाओ मन दर्पण में, धूमिल छवि है, स्तब्ध पड़ी है, नव किरणो का संभल दे कर, तन मन अलंकृत कर दो । पूर्ण  चन्द्र  बन, आ जाओ गुनगुनी निद्रा में, दिवा स्वप्न के द्वारे,झिलमिल तारे, चाँदनी का रूप निखारें, ऐसे ही शीतलता दे कर, सपनो को मेरे सँवारो । निर्झर की निर्मल धारा बन, आ जाओ समय के इस क्षण... »

प्रेम पीपासा

प्रेम पीपासा तृ्प्ती की आस, भटक रहा जीव अनायास, प्रेम व्याप्त है अपने अन्दर, ढूँढ रहा घट-घट के अन्दर, प्रेम ऐसा अनमोल खज़ाना, देने से हीं मिल पाता, माँग रहे सब प्रेम यहाँ देने को न कोई तैयार, ढूँढ रहे सब गठबंधन में, रस्मों के दायरे में बाँध, ये कहाँ है बँधने वाला, अविरल ये तो बहने वाला, प्रेम उन्हीं को मिल पाता, जो ढूँढे अपने में आप, प्रेम खज़ाना असीम अपार बंधन में न इसको बाँध, प्रेम जीवन की है  प... »

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