वज़ह…

दवा मैं दे दूँ तेरे इस गम का,
मेरे गर गम पता बता तो,
सितम मानता हूँ बहोत हुए हैं,
लेकिन मेरे सितम की खता बता तो,
जिद्द ही लिए अब भी बैठे रहोगे,
कभी तो मेरी सज़ा बता दो।

मैं पूजा मानूँ तेरी नज़र को,
मेरी नज़र से नज़र मिला तो,
मेरी भी है मिलने की आरज़ू,
कभी तो सुन ले कभी समझ तो,
तू चुप है और मैं हूँ तनहा,
इशारों में ही गुनाह बता दो।

तेरे लिए ही जीता हूँ यहां मैं,
मेरे इस वचन को गलत बात तो,
तेरी ख़ुशी और तेरे आंशुओं को,
मुझसे अलग हैं क्या ये बता तो,
मैं न समझूँ तेरे जतन को,
तो दोष मेरा सही बता दो।

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1 Comment

  1. महेश गुप्ता जौनपुरी - September 11, 2019, 11:12 pm

    वाह बहुत सुंदर

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