हम वो गुलिस्ता है जो फूलों से नहीं काटों से प्यार रखते है
तिरी समुन्दर सी आँखों में झाँककर यूँ तो डूबे दीवाने कई
समुन्दर जैसा भी हो हम भी ना डूबने का हुनर रखते है
कौन ले के आया फिर तेरे यादों के बिखरे पन्नें
हम तो सिरहाने अपने तेरी यादों की किताब रखते है
मेरी ख़ामोशी को समझ ना ले मेरी ख़ता ये दुनिया
वक़्त पे दिखा देंगे हम भी मुँह में जुबान रखते है
नींद से मरासिम कुछ कम ही सहीं इन दिनों लेकिन
अपनी खुली आँखों में भी हम हरदम कोई ख्वाब रखते है
मर्ज़ की दवा होती तो ले लेता कब से ‘अरमान’
मर्ज़ भी अज़ीज़ हो गया , अक्सर जो साथ रखते है
हर बार गिरे ,फिर सम्भले सिलसिला ये बरक़रार रखते है
हम वो गुलिस्ता है जो फूलों से नहीं काटों से प्यार रखते है
राजेश’अरमान’
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