ग़ज़ल

बंधु !
शक्ति–स्वरूपा माँ दुर्गा की आराधना के अकल्पनीय दिवस और अंतत: वैभव एवं विजय के पर्व ‘दशहरा’ पर मन–मानस में व्याप्त ‘लोभ–मोह–आघात’ के प्रतीक “रावण” का दहन । आप सभी का हार्दिक अभिनंदन एवं मंगल–कामनाएँ ।

गोयाकि ; ग़ज़ल है ! [A03.E004] ग़ज़ल ———–: अनुपम त्रिपाठी

वो ख़्वाब में जो अक्सर दिखाई देता है ।
कौन है जो मुझको हरजाई कहता है ॥

अपने गमों पे खुलकर दीवानगी है हँसना ।
गैरों के लिए रोना रूसवाई कहता है ॥

वो फ़र्द आख़िरी था ‘कल रात’ जो गया ।
फ़िर भी ज़माना हमको तमाशाई कहता है ॥

सब आईनों के अंदर ढूंढें अज़ीब दुनिया ।
है ‘रू…ह’ ‘रू-ब-रू’ तो परछाई कहता है ॥
#anupamtripathi #anupamtripathiG
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फ़र्द/आदमी

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Responses

  1. हमने तो गुजार दी जिंदगी उनको याद करते करते
    फिर भी जमाना हमारे इश्क को वेवफ़ाई कहता है

    1. ” हैं हुस्न और इश्क में सदियों के फासले।
      सीप में कब? किससे?? समंदर भरा गया।।”
      —- अनुपम

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