अच्छाई नहीं मिलती

झूठों की नगरी है साहब, यहाँ सच्चाई, नहीं मिलती….
बुराई के हैं अनगिनत किस्से, पर अच्छाई, नहीं मिलती….

आधे घंटे मे पहुँच जाता है, लोगों के घरों मे पिज़्ज़ा जनाब,
लेकिन वक़्त पर मरीज़ों को फिर भी दवाई, नहीं मिलती….

सर्द रातों मे सड़कों पे ठिठुर रहें हैं इंसान यहाँ पर,
सुकून की नींद तो वो भी सो जाए, पर रज़ाई, नहीं मिलती….

यूँ तो हर रोज़ हर गली हर नुक्कड़ पर होते है दंगे यहाँ,,
फिर भी महाभारत-रामायण सी धरम की लड़ाई, नहीं मिलती….

तिजारत बन कर रह गयी है, शिक्षा आज के जमाने मे,
गुरुकुलों मे होने वाली वो शास्त्रों की पढ़ाई, नहीं मिलती….

मिलावट के इस दौर मे, कुछ भी अच्छा नहीं मिलता ‘हरीश’,
गाय-भैंस तो आज भी वही हैं, पर वो मलाई, नहीं मिलती….

सिसक रही इंसानियत को हो सके तो बचा लो वतनवासियों,
लुटी जो कहीं किसी की आबरू, तो भरपाई, नहीं मिलती….

Comments

2 responses to “अच्छाई नहीं मिलती”

  1. Abhishek kumar

    Nice

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