अधूरी सी जिंदगी का अधूरा फ़साना हूँ मैं।
नई सी दुनिया में शख़्स कोई पुराना हूँ मैं।।
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चल रही है सरहदों पे जंग न जाने कब से।
पता नहीं की किस गोली का निशाना हूँ मैं।।
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मैंने भी देखी थी कई सदियां जिन्दा रहते।
आज क़ब्र में सोया इक शहर वीराना हूँ मैं।।
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हमकों याद करके कभी गमज़दा न होना।
इस मिटटी में दफ़्न हुआ तो खजाना हूँ मैं।।
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मुझको मेरी क़ीमत ख़ुद भी मालूम नहीं है।
वो इस्तेमाल करके छोड़ा गया पैमाना हूँ मैं।।
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हमकों यूँ अलग किया जायेगा मालूम न था।
जैसे नए घरों में पड़ा बर्तन कोई पुराना हूँ मैं।।
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अब तो मदद करती है आँधियाँ भी आ कर।
कभी जुड़ ही नहीं पाया वो आशियाना हूँ मैं।।
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अधूरी सी जिंदगी का अधूरा फ़साना हूँ मैं।
Comments
7 responses to “अधूरी सी जिंदगी का अधूरा फ़साना हूँ मैं।”
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Bahut khoob Ramesh ji
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Thanks
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बहुत खूब
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Thanks
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वाह
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Wah
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Good
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