अपने शब्दों को कभी सच की ,
लिबास न ओढ़ा सका
घुमते रहे मेरे शब्द
झूठ के चिधडे ओढे ,
फटे फटे से कपड़ों में
कितने बेहया से लगते है
शब्द ,जब ढंग की लिबास न हो
शायद वक़्त की दरकार रही
या कहें शंब्दों की अपनी किस्मत
लगाना चाहा जब भी शब्दों
को सच का सुरमा
झूठ के आंसुओं ने उसे
धोकर किनारे रख दिया
मौजूदगी में भी सच
बस दबे -दबे से रह गए
और झूठ अपनी जड़े
बस फैलाता ही चला गया
मेरा सच आज भी दम तोड़ रहा है
मेरे ही सिरहाने पर बैठकर
राजेश ‘अरमान’
अपने शब्दों को कभी सच की
Comments
2 responses to “अपने शब्दों को कभी सच की”
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Good
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वाह
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