अपने ही लोग फिर शहर में दहशत क्यूँ
अपनी ही आँखों में जहर सी वहशत क्यूँ
कहीं तो सुनी जाएगी आख़िर फ़रियाद
किसी सजदे को ,किसी दुआ की हसरत क्यूँ
राजेश’अरमान’
अपने ही लोग फिर शहर
Comments
2 responses to “अपने ही लोग फिर शहर”
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Good
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वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां
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