जिन्दगी की किश्ती सभाँलते– सभाँलते ,
अब मै हार गया हूँ।
क्या करू जिस दरिया मे चलती थी ,अपनी किश्ती वो दरिया मे ही गजब तुफान आ गयी।
और मेरी किश्ती कहीं गुम हो गयी,,
ये भगवान का पासा भी गजब है,
जिसके पास सब कुछ है,उसकी किश्ती भी अमानत है,
दरिया भी उसके तलबे चाटता,,
अब जिन्दगी से हार गया हूँ
आकर थाम ले कोई हाथ मेरा मौला,,
जीने की चाहत मे मौत को पार गया हुँ ।
रिश्ते –नशीब मेहनत सब अजमाये है
मैने मौला।
अब थोड़ी सी उन्यमुक्त गगन ,थोड़ी खुली आसमान दे दे।।
अब इस मतलबी दुनिया से निकलना चाहता —
थोड़ी सी मेरे पंख मे ऊड़ान दे दे
थोड़ी खुली आसमान दे दे।
ज्योति
मो–9123155481

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