अश्को की शबनमी लड़ी

दृग कोमल ढूँढ़ रहे,
अश्को की शबनमी लड़ी,
भावनाओं में जो बसती,
सुख -दुख में बूँद-बूँद बरसती।

सागर में जा मिली या,
कि सीप में मोती बनी,
आह! मैं तो नहीं पी रही,
घूँट- घूँट  घुटन भरी ।

भावनाओं की उथल- पुथल,
कहाँ गयी सुख-दुख की कोलाहल,
बोझिल पलकें हो चली,
नज़रे फिर भी शुष्क पड़ी ।

दिल का दरिया सूख चला,
सुख -दुख अब कैसे पलें,
करूण क्रंदन गरजते बादल,
सम हुए,बरसते-बरसते रूक पड़े ।
दृग कोमल ढूँढ़ रहे ,
अश्को की शबनमी लड़ी ।।

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Comments

4 responses to “अश्को की शबनमी लड़ी”

  1. Praveen Nigam Avatar
    Praveen Nigam

    nice one

  2. Dev Kumar Avatar
    Dev Kumar

    So NIce

    1. Ritu Soni Avatar
      Ritu Soni

      Thanks Dev ji

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