आंखें बोझिल हैं मगर, नींद गई है रूठ,
लगता है कुछ आस भी, आज गई है टूट।
वो खर्राटे मार कर, उड़ा रहे हैं नींद,
हम कोशिश करते रहे, अपनी आंखें मीच।
आंखें बोझिल हैं मगर
Comments
2 responses to “आंखें बोझिल हैं मगर”
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बहुत ख़ूब, कवि सतीश जी की अति सुन्दर हास्य रचना
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अतिसुंदर रचना
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