इन्द्र देव इस बार कुछ, ज्यादा ही तबाही कर रहे हैं
क्रोधित किसी अप्सरा ने किया, हम पर बरस रहे हैं
कहीं पे सूखा पड़ा हुआ है, कहीं पे कहर बरपा रहे हैं
अपनी हरकतों से ना जाने क्यों बाज नहीं आ रहे हैं
सीमित जगह में मूसलाधार बारिश, ये कैसा न्याय है
और कहीं बस आँखें दिखाकर भाग जाना, अन्याय है
बादल फट रहे है कहीं भूस्खलन कहीं बाढ़ आ रही है
कहीं आफत की बारिश से, लोगों की जान जा रही है
यातायात बंद, दुकानें बंद, ये कैसा आतंक मचाया है
व्यवस्था पंगु, लोग घरों में क़ैद, क्या हाल बनाया है
रेल, रास्ते, राशन, बिजली, सब पानी में डूब गये हैं
पानी के तेज बहाव से, शहरों के नक्शे बदल गये हैं
जाने बारिश का दिमाग क्यों इतना खराब हो गया है
जो अपने आवेश में सबकुछ, ख़त्म करने पर अड़ी है
बारिश की आहट से वनस्पति के चेहरे खिल जाते हैं
पर आज उसे भी अपना, अस्तित्व बचाने की पड़ी है
शायद इंद्र को फिर अपने अस्तित्व का डर सताया है
कोई बात नहीं, हमने एक बार फिर कान्हा बुलाया है
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