Yogesh Chandra Goyal, Author at Saavan's Posts

आज़ादी के मायने

क्या सोचके निकले थे, और कहाँ निकल गये हैं ७२ साल में आज़ादी के, मायने ही बदल गये हैं आज मारपीट, दहशत और बलात्कार आज़ादी है पथराव, लूटपाट, आगजनी, भ्रष्टाचार आज़ादी है आरक्षण और अनुदान मूल अधिकार बन गये है आज वासुदेव कुटुम्बकम के मायने बदल गये हैं आज अलगाव, टकराव और भेदभाव आज़ादी है संकीर्णता, असहिष्णुता, और बदलाव आज़ादी है लालची, निठल्ले और उपद्रवीयों का बोलबाला है सम्मान, संवेदना और सद्भाव का मुंह काला... »

मुलाकात (हास्य व्यंग)

कल कालेज के एक पुराने मित्र से मुलाकात हो गयी देख कर भी नहीं पहचाना, कुछ अजीब बात हो गयी मैं बोला, क्यों भाई, पुराने यारों से याराना तोड़ लिया कालेज के मोटू से आज, अपना मुंह कैसे मोड लिया मोटापे के जंगल में मंगल, परिवर्तन कैसे कर लिया अपना चोला, मेरे मोटू भाई, इतना कैसे बदल लिया मैं क्या अपना कोई दोस्त, तुझे नहीं पहचान सकता ८० को देख १२० किलो वाला, कोई नहीं मान सकता कीटो डाइट, नेचुरोपेथी, या बेरिया... »

बढ़ती उम्र

बढ़ती उम्र का मतलब ये नहीं कि इंसान जीना छोड़ दे सारे काम बन्द कर मौत का इंतज़ार करना शुरू कर दे सेवानिवृति एक पड़ाव है जहां थोड़ा कुछ बदल जाता है थोड़ा पीछे छूट जाता है, और थोड़ा नया मिल जाता है बढ़ती उम्र डरने या नकारात्मक सोचने का नाम नहीं है और जीवन यात्रा में सेवानिवृति, रुकने का नाम नहीं है सेवानिवृत होने का मतलब जीने पर पूर्ण विराम नहीं है ये तो बस एक कोमा है, जीवन पर कोई लगाम नहीं है सोच अगर तंग र... »

बारिश को हद में रहना होगा

कोई बारिश से कहदे, उसको हद में रहना होगा गर बरसना है तो हमारी शर्तों पर बरसना होगा बेलगाम, बेखौफ, बेवक्त कहीं भी यूं बरस पड़ना और झमाझम बरस के सड़कों पर हंगामा करना ये माना कि हर तरफ पीने के पानी की कमी है लेकिन जीव पर अत्याचार, बारिश की बेरहमी है यहाँ पर बरसने को प्रशासन की मंजूरी जरूरी है व्यवस्था से बगावत करना तो बर्दाश्त नहीं होगा यहाँ सड़कों में गढ़ढ़े और खुले मेनहोल आम है गटर और गंदे नाले अवरुद्ध... »

हँसकर जीना दस्तूर है ज़िंदगी का

हँसकर जीना दस्तूर है ज़िंदगी का एक यही किस्सा मशहूर है ज़िंदगी का बीते हुए पल कभी लौट कर नहीं आते यही सबसे बड़ा कसूर है ज़िंदगी का जिंदगी के हर पल को ख़ुशी से बिताओ रोने का समय कहां, सिर्फ मुस्कुराओ चाहे ये दुनिया कहे पागल आवारा याद रहे, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा »

ये दोस्ती

मेरी दोस्ती पर लिखी ये कविता, दोस्तों को समर्पित ये दोस्ती अल्हड़पन के लंगोटिये, ५० साल से साथ चल रहे हैं दोस्ती की किताब में रोज़, नये अध्याय लिख रहे हैं हमारी दोस्ती जगह, जाति, धर्म, वंश से अनजान है विद्वानों की फौज का जीवन में अहम् योगदान है सभी एक दूसरे की शान है, आधार जैसी पहचान है सब दोस्त जब तक साथ है, हर मुश्किल आसान है दो हज़ार का पता नहीं, कभी दो रूपए को लड़ते थे खाई में धकेल कर, बचाने भी खु... »

निराशा बोल रही है

माफ़ करना, ये मैं नहीं, मेरी निराशा बोल रही है नासमझ, मेरी सहनशीलता को, फिर तोल रही है सुकून गायब है, ज़िंदगी उलझी २ सी लग रही है कोशिशों के बाद भी, कोशिश, बेअसर लग रही है मंजिल तक पहुँचने की कोई राह नज़र नहीं आती जूनून दिल में बरकरार है, निराशा घर कर रही है सीधी सच्ची मौलिक बात, इन्हें समझ नहीं आती मेरी कोई कोशिश, किसी को भी, नज़र नहीं आती मेरी कोशिश में ये लोग अपनी पसंद क्यूं ढूंढते हैं उनकी पसंद से... »

आवाज को नहीं, अपने अलफ़ाज़ को ले जाओ बुलंदी पर

आवाज को नहीं, अपने अलफ़ाज़ को ले जाओ बुलंदी पर बादलों की गरज नहीं, बारिश की बौछार फूल खिलाती है »

जलने और जलाने का बस इतना सा फलसफा है

जलने और जलाने का बस इतना सा फलसफा है फिक्र में होते है तो खुद जलते हैं बेफ़िक्र होते हैं तो दुनिया जलती है »

मुझ पर दोस्तों का प्यार

मुझ पर दोस्तों का प्यार, यूँ ही उधार रहने दो बड़ा हसीन है ये कर्ज, मुझे कर्जदार रहने दो »

Page 1 of 3123