इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।
सोचा तो था की मुकम्मल जहां होंगे हम।।
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रोज़ आते है ख़्याल हमकों परेशान करने।
अब जितना कहेंगे उतने ही रवां होंगे हम।।
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तुम फ़लक ए हुस्न हो हमसे क्या है वास्ता।
हुए जो जिंदगी से रूबरू क्या फ़ना होंगे हम।
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खुशियों की फ़ेहरिस्त में नहीं कही नाम मेरा।
अब ग़मो से क्या कहें कोई सज़ा होंगे हम।।
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हमकों मिली नहीं मंजिल इक अरसा हुआ।
साहिल मुमकिन ये है गुमनाम पता होंगे हम।।
@@@@RK@@@@
इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।
Comments
7 responses to “इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।”
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बहुत खूब
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धन्यवाद सर
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nice one
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धन्यवाद
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Good
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वाह बहुत सुंदर रचना
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बेहतरीन सृजन
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