एक जरूरी दस्तावेज ही तो है जीवन
न कागज़ अपना न स्याही अपनी
फिर भी भ्रम अपना कहने का
अपनी सासें अपनी धड़कन से विवाद करती
कभी तालमेल नहीं मन से मन का
फिर भी भ्रम अपना कहने का
मन से मन मिलता नहीं फिर भी
हर संयम अपना ही उपहास करता
फिर भी भ्रम अपना कहने का
यथार्थ हो गए पुराने अख़बार से
हम लिपट गए किसी शै की तरह
फिर भी भ्रम अपना कहने का
राजेश ‘अरमान’
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