रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया,
जिससे उढते धुएँ में इंसानियत का रिसता खुन नज़र आया,
हँसते हुए चेहराे में, खुद को झूठा साबित करता हर इंसान जाे पाया,
तब कहीं जाकर हमें भी कलयुग की रामलीला का सार समझ आया,
रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!!
कुछ आेर आगे बडे, ताे खंडर हुईं ईमारताें का मलबा था,
कहीं दुआ दबी थी , कहीं काेई शिकायत, कहीं ममता बिखरी पड़ी थी,
ताे कहीं साेने की ईंटों के नीचे दबा लाचार ईश्वर चिखता पाया,
रास्ताें से गुजरते हुए ईक शहर नजर आया….!!!
-राज बैरवा’मुसाफिर’

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