कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
माना की शब की जीस्त दुआओं से है भरी
हो असर ऐसा ख़्वाबों को सहर कर दिया जाएँ
फूल भी चुभते रहे ताउम्र किसी खंजर की तरह
चलो किसी खंजर को फूलों से भर दिया जाएँ
लाजिमी हो के कुछ वक़्त यू भी मिल जाएँ
किसी पिंजरे से रिहा खुद को कर दिया जाएँ
तिश्नगी सेहरा की न थी इस दिल को ‘अरमान’
कभी ऐसा हो तस्सवुर में समुन्दर भर लिया जाएँ
कभी तो मेरे माजी का क़त्ल कर दिया जाएँ
जख्म जैसा भी हो कुछ पल भर दिया जाएँ
राजेश ‘अरमान ‘
कभी तो मेरे माजी
Comments
2 responses to “कभी तो मेरे माजी”
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वाह बहुत सुंदर
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Nice
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