जितना भी देखा है मनो उतना ही कम देख है,
मैंने इस दुनियाँ की आँखों में कितना कम देखा है,
सड़कों पर पनपती इन बच्चों की कहानी से,
किरदार जब भी देखा अपना मैंने विषम देखा है,
बेबस रिहाई की उम्मीद में ज़िन्दगी को ढूंढते अक्सर,
लोगों की आँखों को होते हुए मैंने नम देखा है।।
राही (अंजाना)
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