कविता — बिका हुआ खरीददार

बेशक; तुम खरीद लोगे!
……………… बिछाओगे
निचोड़ कर फेंक दोगे; मुझे
: एक हिकारत के साथ…..

लेकिन; फिर भी हार जाओगे !
हाँफती साँसों से यकीनन
: कैसे पार पाओगे ?

पीड़ा और समर्पण से गुज़रकर
मुस्कुराऊंगी : मैं—-विजयी बनकर

क्योंकि ;
अपने दाम———–
मैंने खुद तय किए हैं.

Comments

3 responses to “कविता — बिका हुआ खरीददार”

  1. Anirudh sethi Avatar
    Anirudh sethi

    aapki kavita ko naman _/\_ _/\_

  2. Panna Avatar
    Panna

    aprateem kavya

  3. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar

    वाह बहुत सुंदर रचना ढेरों बधाइयां

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