जन्म लिया जब बेटी ने
खुशी थी घर में छाई,
घर में आनन्द मगन सब
घर की बगिया महकाई
खेलकूद कर बड़ी हुई
सुंदर सी शिक्षा पाई
बिखेर देती चहुंओर खुशियां
बनकर रहती मां की परछाई
दिन बीतते देर लगी न
विवाह की उम्र हो आई
मिल जाए कोई सुयोग्य वर
पिता ने घर-घर दौड़ लगाई
रिश्ता तय हुआ लाखों में
विवाह की मंगल बेला आई
चल रही बेटी के मन में
ये ****कश्मकश***
मैं भी तो मां की जाई
भाई लगता सबको अपना सा
मैं भी मां-पापा की बेटी
फिर मैं हुई कैसे पराई ?
फिर मैं हुई कैसे पराई
स्वरचित एवं मौलिक रचना
—✍️एकता गुप्ता *काव्या*
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