यह कहक़हा लगा कर ,
मुझे झुकाकर कहां चल दिए।
मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर,
सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए।
मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार,
ठहरा कर कहां चल दिए।
मैं मांगती रही इंसाफ इस दर पर,
तुम मुझे ठुकरा कर कहां चल दिए।
अब बता दो जश्न जीत की या मेरे हार की,
मनाने कहां चल दिए?
मैं मिलूंगी कहीं ना कहीं ,
किसी और सूरत में ,
फिर से पूछूंगी ये सवाल।
मेरी अस्मत पर दाग लगा कर कहां चल दिए?
तुम हंस रहे हो मेरी हार पर,
अगली जीत मेरी ही होगी ।
अब तुम लगा सकते हो।
यह कहकहा, मुझे झुका कर।