यह कहक़हा लगा कर ,
मुझे झुकाकर कहां चल दिए।
मेरी धूमिल आंखों से ओझल होकर,
सच को झूठ बनाकर कहां चल दिए।
मैं थी बेकसूर, तुम कसूरवार,
ठहरा कर कहां चल दिए।
मैं मांगती रही इंसाफ इस दर पर,
तुम मुझे ठुकरा कर कहां चल दिए।
अब बता दो जश्न जीत की या मेरे हार की,
मनाने कहां चल दिए?
मैं मिलूंगी कहीं ना कहीं ,
किसी और सूरत में ,
फिर से पूछूंगी ये सवाल।
मेरी अस्मत पर दाग लगा कर कहां चल दिए?
तुम हंस रहे हो मेरी हार पर,
अगली जीत मेरी ही होगी ।
अब तुम लगा सकते हो।
यह कहकहा, मुझे झुका कर।
कहां चल दिए!
Comments
10 responses to “कहां चल दिए!”
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सुंदर
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धन्यवाद सर
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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धन्यवाद
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सदियों से शोषण का शिकार होती आई नारी की व्यथा , उसके मन में पले भाव आदि की बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुति
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इतनी सुंदर समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद जी
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शोषण की शिकार नारी की दुखती कहानी का यथार्थ चित्रण,और उसकी मनोदशा को बहुत ही खूबसूरती से बयां किया है।
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बहुत बहुत धन्यवाद गीता मैम
हौसला बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद
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सुन्दर
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धन्यवाद
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