कागज की कश्ती

कागज की कश्ती
जिसमें तैरता था बचपन कभी
बहता था पानी की तेज धारों में
बिना डरे, बिना रुके
न डूबने का खोफ़
न पीछे रह जाने का डर

जिंदगी गुजरती गयी
बिना कुछ लिखे
जिंदगी के कागज पर
लिखा था जो कुछ
घुल गयी उसकी स्याही
वक्त के पानी में बहकर
अब खाली खाली सी है जिंदगी
बहने को तरसती है
बिना रुक़े, बिना डरे

Comments

6 responses to “कागज की कश्ती”

  1. Ajay Nawal Avatar
    Ajay Nawal

    Please share my poem and help me win the contest 🙂

    1. Ajay Nawal Avatar
      Ajay Nawal

      thank u panna

  2. UE Vijay Sharma Avatar
    UE Vijay Sharma

    अब खाली खाली सी है जिंदगी
    बहने को तरसती है ..Beautiful

    1. Ajay Nawal Avatar
      Ajay Nawal

      thank u sir

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