लहू है बहता सड़कों में आक्रोश है कुम्हलता गलियों में लफ़्जों मे है क्यों नफ़रत का घर आग है फैली क्यों फिजाओं में रंगो में है क्यों बारूद भरा क्यों दीये अंधेरों में रोते है […]

कागज की कश्ती जिसमें तैरता था बचपन कभी बहता था पानी की तेज धारों में बिना डरे, बिना रुके न डूबने का खोफ़ न पीछे रह जाने का डर जिंदगी गुजरती गयी बिना कुछ लिखे […]

सुनो, मैंने भी एक दौर देखा हैं.. पिछले कुछ समय में मैंने एक दौर देखा हैं, मैंने अन्ना का आंदोलन देखा हैं, मैंने निर्भया की माँ देखी हैं, मैंने रोहित वेमुला की लाश देखी हैं, […]

निकल जाते है उन रास्तों पर जिनकी कोई मंजिल नहीं अंधेरे होते है जिन राहों में मगर कोई अंजुमन नहीं होते है कांटे, कंकड़ फूलों का बागान नहीं बस इक साथी की तलाश होती है […]

दमन चक्र में घिरे हुए नर की व्यथा कौन कहे शोषित होती नारी के, आसूओं में कौन बहे दिखती है अंधी दुनिया मुझे अपने चारो ओर ऐसी परायी दुनिया में बोलो कौन रहे ??

जब सोचा इक दफ़ा जिन्द्गी के बारे मे किस कदर बसर हुई जिंदगी मेरी क्यों भटकता रहा जिंदगीभर मुसाफ़िर बनकर ज्वालामुखी सा जलता रहा कभी लावे सा पिघलता रहा  आसमां को छुने की आरजू में […]