किश्तें बाकी रह गई

गलतफहमियों की कितनी और किश्तें बाकी रह गईं,
इंसानों की कितनी और देखनी किस्में बाकी रह गईं।।

नज़र-नज़ारे दिल-दिमाग और जुदाई सबपे लिखा मैंने,
कहना मुश्किल है के और कितनी नज़में बाकी रह गईं।।

राही अंजाना

Comments

4 responses to “किश्तें बाकी रह गई”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Very good

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