4 Comments

  1. “न आने का मालूम न जाने का मालूम
    बीच के ही सपनों में होता है मन गुम।
    खुली नींद सपना जैसे ही टूटा
    वैसे ही डोरों से नाता छूटा।”
    जीवन के एक अलग ही दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती हुई कवि सतीश जी की बेहद गंभीर रचना, जो कुछ सोचने को मजबूर कर देती है।
    बहुत लाजवाब अभिव्यक्ति, उत्तम लेखन

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