विधा-ग़ज़ल
काफिया-ओ
रदीफ़-तो कभी
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चाहती हो मुझे अगर बताओ तो कभी
देख कर मुझको मुस्कुराओ तो कभी
यूँ ना तड़पाओ तुम इतना दिल को मेरे
हाल-ए-दिल अपना सुनाओ तो कभी
दोस्त तो है बहुत पर तुझ से ना कोई
पास बैठकर तुम बतियाओ तो कभी
गम तो बहुत है जिंदिगी में मेरे दोस्त
अपनी प्यारी बातो से हँसाओ तो कभी
अगर रूठ जाऊं किसी बात पर तेरे
तो प्यार जताकर मनाओ तो कभी
क्या रखा है इस छनभंगुर जीवन में
कुछ पल मेरे साथ बिताओ तो कभी
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