कोई वज़ह यूँ भी

कोई वज़ह यूँ भी
निकल आती
तेरे मिलने की
तारों की सजी डोली
लेके आता कहार
मेरे मन के द्वार
मैं मन ही मन में
रूप लेता निहार
काश उस डोली में
कोई ख्वाब सजा होता
आँखों ने लिए थे
संग जिसके सात फेरे
राजेश’अरमान’

Comments

One response to “कोई वज़ह यूँ भी”

  1. Abhishek kumar

    क्या बात है

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