ख़ुद को मैं बेकार समझता हूँ,

मैं ख़ुद को बेकार समझता हूँ,
हूँ नहीं, मगर यार समझता हूँ,

आपकी भी कहानी से वाक़िफ हूँ,
आपका भी किरदार समझता हूँ,

आप मुझे बेवकूफ़ समझते हैं,
आपको मैं समझदार समझता हूँ,

आपको मैं बिल्कुल पसंद नहीं हूँ,
कहिये मत, इनकार समझता हूँ,

आपको आपकी जीत मुबारक हो,
अपनी जीत को मैं, हार समझता हूँ,

तुम्हें जब से हासिल हूं आसानी से ,
आसानी को अब दुश्वार समझता हूँ,

~© शिवांकित तिवारी “शिवा”

Comments

One response to “ख़ुद को मैं बेकार समझता हूँ,”

  1. बहुत सुन्दर रचना 

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