आपके-गीत-क्रमांक-20- दिनांक-16 -01-2018
खूँटी और दीवार
गीतकार-जानकी प्रसाद विवश
साथ तुम्हारा मेरा…साथ तुम्हारा मेरा जैसे
खूँटी ओर दीवार का।
साथ हुआ है जिस पल से भी,
हम दोनों ही साथ रहे।
अपनी भार वहन क्षमता से,
बढ़चढ़ कर हैं भार सहे।
कभी उखड़ना फिर ठुक जाना
अपनी तो है नियति रही,
नहीं अपेक्षा रही तनिक भी
कभी कोई आभार. कहे।
खूब समय की लीला देखी
बन गुम्बद मीनार का।
टूटे जब भी ,छोड़ गये,
टूटन के अमिट निशान को।
आँच न आने दी हमने,
कर्तव्य पुजारिन शान को।
कौन न टूटा है इस जग में
टूटना जुड़ना खेल है,
किंतु टूटने कभी न दी,
अपनी साबुत पहचान को।
दें जबाब आशा की किरणें
दंभी तम के वार का।
निरंतर पढ़ते रहें।……सभी मित्रों को
गीत सवेरे का शुभ प्रभात……..
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