अंधेरे और तूफानों से घिरा, एक दीया
खुद को जलाकर, अपनी लौ बढ़ाकर
बेख़ौफ़ सामना करता रहा…।
भले ही उसका आकार छोटा था, परन्तु हौसला अपने चरम पर था।
संघर्ष कर रहे दीये से, तूफ़ान ने पूछा-
“तू व्यर्थ की कोशिश क्यों करता है,
ये अंधेरे की दुनिया है, इसके आगे हर शीष झुकता है”
दीये ने मुस्कुरा कर बोला-
“फ़र्क नही पड़ता मुझे, मैं बुझ जाऊं या मिट जाऊं,
मुझे बस एक खुशी की ख्वाहिश है,
मेरे बुझने के बाद, ईश्वर, सबको यह कह सके-
“अंधेरे को मिटाने की कोशिश, एक नन्हा दीया करता रहा…
और अपनी आख़िरी लौ के साथ
इस मिट्टी में दफ़न हुआ…”

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