वो तो गूलर का फूल लगता है
मेरे दिल का फ़ितूर लगता है ।
ना शाम लगता है ना सुबह लगता है
सर्दी की दोपहर वो लगता है ।
वो तो भीगा गुलाब लगता था
वो तो भीगा गुलाब लगता है
मेरा दर्पण तो वही है लेकिन
चेहरा कितना उदास लगता है ।
वो तो छूते ही चीख उठता है
कितना कोमल है फूल टेसू का
दर्द मेरा बढ़ गया है अब इतना
फूल से प्यारा शूल लगता है ।
वो रजनीगंधा है महकता है
जाने दिन-रात किसके दामन में
मेरी किस्मत में नहीं है फिर भी
मुझको मेरा नसीब लगता है ।