गूलर का फूल

वो तो गूलर का फूल लगता है
मेरे दिल का फ़ितूर लगता है ।

ना शाम लगता है ना सुबह लगता है
सर्दी की दोपहर वो लगता है ।

वो तो भीगा गुलाब लगता था
वो तो भीगा गुलाब लगता है

मेरा दर्पण तो वही है लेकिन
चेहरा कितना उदास लगता है ।

वो तो छूते ही चीख उठता है
कितना कोमल है फूल टेसू का

दर्द मेरा बढ़ गया है अब इतना
फूल से प्यारा शूल लगता है ।

वो रजनीगंधा है महकता है
जाने दिन-रात किसके दामन में

मेरी किस्मत में नहीं है फिर भी
मुझको मेरा नसीब लगता है ।

Comments

12 responses to “गूलर का फूल”

  1. खूबसूरतअभिव्यक्ति

  2. महेश गुप्ता जौनपुरी Avatar

    वाह बहुत सुंदर रचना

    1. थैंक्स फॉर कमेंट्स

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