चुपके से कोई शाम ढल जाती है

चुपके से कोई शाम ढल जाती है
और छोड़ जाती है जागती रातें
रातें करवटें बदलती है
तारे जागते पहरा देते है
ख्वाब आँखों में जगमगाते है
होती फिर तैयार एक सुबह
आतुर है मन देखने को एक नई सुबह
व्याकुल है मन पड़ेगी देखनी फिर वही सुबह
सुबह आती है कुछ श्रृंगार किये
सूरज ले के आता सवालों के पुलिंदे
जवाब जिनका छुपा बैठा है तारों में
आँखे खुलती है सवालों की भीड़ में
साँसें चलती है जवाबों की तलाश में
फिर खो जाता हूँ दिन भर के लिए
बस खो जाता हूँ फिर ढूंढ़ता हूँ
खुद को अपने ही इर्दगिर्द
इसी कश्मकश में फिर ,
चुपके से कोई शाम ढल जाती है
राजेश’अरमान’

Comments

2 responses to “चुपके से कोई शाम ढल जाती है”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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