कविता … “ प्रेम ही बांटो हरदम, आप अपने सूझ-बुझ से”
छप्पर उड़ गई है, मिट्टी की दीवारों से।
तूफाँ भी मांग रही है मदद, कामगारों से।।
कट्टरता की बू आती है, अब बयारों से।
मुर्दे फिर से जी उठे हैं, धार्मिकता नारों से।।
रोशनी की चाहत है, चिता के अंगारों से।
मोह भंग हुआ क्यों? दीपक के उजियारों से।।
संदेशा कह देना मैना, तैयार रहे कहारों से।
आग कहीं लग ना जाये, आज चुनावी नारों से।।
आप भी वाकिफ़ होंगे चाणक्य बेमिसाल से।
राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों के कमाल से।।
पर अर्थशास्त्र तो हरहम बेबस है अकाल से।
राजनीति ही लहलहाती है नित नये चाल से।।
कानों पर हाथ धरो, बचे रहो झूठे अफसानों से।
दरवाजे अपने बंद रखो, दुर रहो तुम शैतानों से।
इंसान गुजरते देखा है, मैंने अक़्सर मयखानों से।
सदभावना यहीं पर बसती है, पूछलो सयानों से।।
जड़ जमीन लूट रही है, जाने कितने धन्धों से।
हाथी भी न बच सका आज बिछाये फन्दों से।।
हाल पुछो एक बार तुम कौओं और गिद्धों से।
मुहब्ब़त क्यों नहीं रही? जंगल के बासिंदों से।।
हाथ लगाओ गले मिलो, स्नेह भरी जजबातों से।
मिश्री घोलकर पिला दो, सबको अपनी बातों से।।
चलो, उठो इतिहास लिखो अपने अडिग इरादों से।
हरा भरा कर दो गुलशन मेहनत की सौगातों से।।
घड़ी कठिन मगर दामन छूटा नहीं है सुख से।
बहुत दफ़ा निकल आये हैं हम तो ऐसे दु:ख से।।
नफ़रत मत बोना प्यारे, कभी भी भूलचूक से।
प्रेम ही बांटो हरदम, आप अपने सूझ-बुझ से।।
ओमप्रकाश चन्देल ‘अवसर’
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

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