जिधर का रुख

जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना
इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना

वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का
कभी हाथों में तुम एक टूटा आईना रख लेना

ज़िंदगी के खेल में कभी शह मिली कभी मात हुई
इन हिसाबों को दबाकर तुम किताबों में रख लेना

अपना सा लगता है कोई आसमा से टूटा हुआ तारा
अपने आगोश में तुम बचपन के टूटे खिलोने रख लेना

ज़ंग मैदान की हो या अपने अंदर ,बस बुरी होती है
अपने अंदर ही तुम सुकून की कोई दवा रख लेना

बेसबब बात भी निकल जाती है हलकों से ‘अरमान’
क्या ज़रूरी है हर बात को अपने दिल में रख लेना
राजेश’अरमान’

Comments

One response to “जिधर का रुख”

  1. Abhishek kumar

    👏👏

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