जिसे हम जीना कहते हैं,
वो पल-पल मरना है जानो,
निज हित में रत रहना,
खाना, सोना , जगना ये,
जीना नहीं है मानो ।
सृष्टि की श्रेष्टतम रचना का,
मूल्य तो तुम अॉको,
जग हित में जो अपना,
तन-मन अर्पण कर दे,
प्राणियों के हित में,
जीवन समर्पण कर दे,
नई डगर मानव के ,
हित गढ़ दे,सूने जीवन में,
किसी के आशाएँ भर दे,
जीना इसे हीं कहते हैं।
जो न कुछ कर पाओ,
तो तुम सदभावना तो बाँटो,
अहिंसा के पथ पर चल कर,
लाचारो के दर्द छाँटो।
जीना उसे कहते हैं जो,
मानव होने का फर्ज,
पूरा कर दे,उस रचनाकार ,
का कर्ज पूरा कर दे ।।
https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/12/19

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