जीवनसमुद्र

कट जाते है दिन
पैसो की झनकार सुनने के लिए |
किन्तु रात आते-आते
शुष्क पड़ जाता है वह जीवनरस;
जिसे पीने के लिए
मथते रहते है जीवनसमुद्र |

-Bhargav Patel (अनवरत)

Comments

3 responses to “जीवनसमुद्र”

  1. Abhishek kumar

    सुन्दर रचना

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