जो भी लिखता हूँ कविता
आप इश्रत ही समझना,
न मुझसे, न खुद से
बस खुदा से तिश्रगी रखना।
जब कभी मित्र बनकर
बैठना चाहोगे तो मैं भी
बिठाउँगा खुशी से आपको
दिल के बियाँबा में।
जो भी लिखता हूँ कविता
आप इश्रत ही समझना,
न मुझसे, न खुद से
बस खुदा से तिश्रगी रखना।
जब कभी मित्र बनकर
बैठना चाहोगे तो मैं भी
बिठाउँगा खुशी से आपको
दिल के बियाँबा में।