डर अब अँधेरी रातों से नहीं लगता,
क्योंकि रातें अपने आगोश में सुला लेती है।
डर तो रौशनी की किरणों से लगता है,
क्योंकि रौशनी सब कुछ साफ़ साफ़ दिखा देती है।
डर
Comments
6 responses to “डर”
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Shi
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Thank u sir
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Very nice
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Thank u
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Waah
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वाह बहुत सुंदर रचना
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