bhoomipatelvineeta's Posts

रंगों का खेल

रंगों से ही समा बांधे जाते हैं, रंगों से ही ये ज़मीं आसमां जाने जाते हैं। जनाब पर अब तो रंग भी धर्म के नाम पर बाँट दिये जाते हैं, और ये रंग गुरूर की मिसाल बन जाते हैं। रंगों के कारण भेद भाव होता देखा है, पर अब तो रंगों के साथ भेदभाव होता है। डर लगता है प्रकृति हरी देख कर मुसलमान को न दे दें, खून लाल देख कर हिंदू का हक न जम जाए। गुज़रिश् है की रंगों को मन की खुशियाँ ही बढ़ाने दो, वरना जहाँ में भी सर... »

कैसे कहूँ?

कैसे कहूँ, किससे कहूं कि हाल ए दिल क्या है, रोना अकेले ही है अंजाम ए बयान क्या है। जब तक खुश रहती हूँ, लोगों की हंसी सुनाई देती है। जब दुखी होती हूँ बस अपनी चीख सुनाई देती है। बाते बहुत है पर डर लगता है कुछ कहने से, बहुत से किस्से हैं दिल के कोने में सहमे से। डर लगता है लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे मेरी बाते सुनकर। इसीलिए मैंने भी खुद को छुपा लिया कुछ किरदार चुनकर। खुदको खोने का डर भी सताता है, आ... »

Fear

Not afraid of being judged, Nor my image being smudged. No fear of the talks that give me tear, Nor from the one that makes my heart wear. But petrified of being misunderstood, Once it happens my heart is not less than wood. That is being cut from the stoned words, This is the only fear in my eyes that lurks. »

शोक

तुम ज़िंदगी से जीते नहीं,मगर लड़े तो थे. यह बात कम नहीं कि तुम जिद पर अड़े तो थे. गम तो हमेशा रहेगा कि बचा ना सके तुम्हे, वरना हमे बचाने तुम तो वहाँ खड़े ही थे…… »

दरिंदगी

कितने दरिंदगी के हाँथ है इस दुनिया में, कि अब इंसानियत का चेहरा शर्म से लाल है। और उस बच्ची का जिस्म खून से बदहाल है। दिल में ख्वाब थे,कन्धों पर किताबों का बोझ , चली जा रही थी स्कूल अपनी तकदीर लिखने , बड़ी मासूम थी उस बच्ची की सोच। पीछे आहट थी कुछ काले क़दमों की, और वो ही शुरुआत थी इन गहरे जख्मों की। वो दिल्ली की मोमबत्ती पिघल कर , बेह गयी है इस दरिंदगी के दरिये में। वो शख्स नहीं मर्द है,जो देता ऐसे... »

डर

डर अब अँधेरी रातों से नहीं लगता, क्योंकि रातें अपने आगोश में सुला लेती है। डर तो रौशनी की किरणों से लगता है, क्योंकि रौशनी सब कुछ साफ़ साफ़ दिखा देती है। »

बचपन

बारिश के मौसम में कागज़ की कश्ती डूबने का इंतज़ार ही करती रह गयी। और ये बच्चे उड़ने के सपने लिए उस कागज़ को पढ़ते ही रह गए। »

मैदान ए जंग

ज़िन्दगी की जंग के मैदान में, तुम भी खड़े हो मैं भी खड़ी हूँ। फ़र्क है तो इतना की मैं किसी को मारना नहीं चाहती, और तुम किसी और से मरना नहीं चाहते। »

गुस्ताखियाँ

यूं तो अरमानों के इरादे भी परेशान हैं, पानी की बूँदें भी आँखों की बारिश से हैरान हैं| पर जनाब हमारी गुस्ताखियों की भी हद नहीं होती, ऐसी केफ़ियत में अपनी ही परछाई में सुकून ढूँढ लिया करते हैं| »

दुनिया जीतकर मैं ममता हार गयी

चल पड़ी उस राह पर,जहां काटें बहुत थे| माँ, तेरी फूल जैसी गोदी से उतरकर ये काटें बहुत चुभ रहे थे| चलते हुए एक ऐसा काटा चुभा था, कि ज़ख्म से खून आज भी निकल रहा है| माँ, मंजिल पर तो पहुँच गयी हूँ, पर इसकी ख़ुशी मनाने के लिए है तू ही नहीं है| यूं तो मैं तेरी मल्लिका थी, पर मैं तुझे रानी बनाना चाहती थी| लेकिन पता नहीं था मुझे कि तेरे दिल में, मुझे पाने का फ़कीर जिंदा था| माँ, वो तेरे शब्द जो मैंने सफलता के... »

नींद

आजकल नींद सोती है मेरे बिस्तर पर, और मैं तो ख्यालों की दुनिया मैं टहलने निकल जाती हूँ| »

जीतना

मुझको मुझसे जीत कर, खुशियाँ मना रहे थे वो| शायद हारकर जीतने और जीत कर हारने के , उस एहसास से वाकिफ़ न थे वो| »

The Dark Night

She was walking alone on the street, having shoes in foot with cleat. It was the darkest day of her life, like someone stabbed her with knife. Moon was shining, darkness was thriving. In the midst of glimmering whiteness, she was there with forthrightness. Her steps shortened suddenly, frightened by the some steps coming cunningly. Those were the steps of some dolt, they pushed her with a jolt. Sh... »

भारत के रक्षक

इतिहास है आज भी जिस पर मौन, वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन? जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए, और मरता रहा किसी के लिए| रहता है वो सबसे दूर, देश के प्यार में है वो मजबूर| दो देशों की ‘नेतागिरी’, जिसमे है अब सेना ‘गिरी’| जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार| बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार| न जाने क्यों बटा है ये जहां, जिसमे ली है लोगों ने पनाह| हर द... »

भारत के रक्षक

इतिहास है आज भी जिस पर मौन, वह है आखिर कौन, वह है आखिर कौन? जो लड़ता रहा हर समय किसी के लिए, और मरता रहा किसी के लिए| रहता है वो सबसे दूर, देश के प्यार में है वो मजबूर| दो देशों की ‘नेतागिरी’, जिसमे है अब सेना ‘गिरी’| जिसकी माँ करती उसके लिए हमेशा इंतज़ार| बेटी कहती है बार बार,लगता है हो गये साल हज़ार आपका करे दीदार| न जाने क्यों बटा है ये जहां, जिसमे ली है लोगों ने पनाह| हर द... »

नादान

हर एक तनहा लम्हे में एक अर्थ ढूँढा करती थी| हर अँधेरी रुसवाई में गहरा अक्श ढूँढा करती थी | मैं मेरी परछाई में एक शख्स ढूँढा करती थी| मेरी मुझसे हुई जुदाई में कुछ वक़्त ढूँढा करती थी | लोग कहते थे की नादानी का असर है, मैं उस नादानी में भी कदर ढूँढा करती थी| »

दिल और दिमाग

यूँ तो दिल उबल रहा है, शब्दों के उबाल से | और ये कम्बखत दिमाग कहता है, अपने ज़ज्बातों को संभाल ले | »

तन्हाई

न जाने क्यों एक तन्हाई सी छा रही है, ज़िन्दगी एक कहानी सी बनती जा रही है। न जाने क्यों ये दिल खुद को अकेला पा रहा है , हकीकत से परे ही जा रहा है। आँखों से दर्द बह रहा है, पानी तो सिर्फ एक जरिया है। न जाने तन्हाई का कितना बड़ा दरिया है। इन राहों में बहुत सी ‘जानें’ हैं, पर दुःख तो यह है कि सभी अनजाने हैं। बस!चल पड़ी अब सच की राह पर, सच्ची दुनिया पाने की चाह पर। पर ये सच अकेलापन क्यों है ला... »