ना जाने किस भँवर में हूँ इक ठिकाना ढ़ूढ़ता हूँ,
जिन्दगी जी लूँ ज़रा सा बस फ़साना ढ़ूढ़ता हूँ,
प्यार की कश्ती में लगता डूबता ही जा रहा हूँ,
मौत से मिल जाऊँ इक दिन बस बहाना ढ़ूढ़ता हूँ
“ढ़ूढ़ता हूँ”
Comments
4 responses to ““ढ़ूढ़ता हूँ””
-

Nice line
-

thanks a lot
-
-

वाह बहुत सुंदर
-

वाह बहुत सुंदर रचना
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.