ज्ञान की पोथियाँ सारी चन्द पैसों में तोल लेता हूँ मैं,
जो भी जब भी मुँह में आ जाये यूँही बोल देता हूँ मैं,
समझ पाता नहीं हूँ किताबों में लिखे काले अक्षर मैं,
सो तराज़ू के बाट बराबर ही सबका मोल लेता हूँ मैं,
लोहा रद्दी प्लास्टिक को बेचने वाले क्या समझेंगे ये,
के दो रोटी की ख़ातिर अपना ठेला खोल लेता हूँ मैं।।
राही अंजाना
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