ताला

दिल के मेरे ताले की अजीज़ चाबी ले गया कोई,
उम्र भर के लिए जैसे बेताबी दे गया कोई,

शरारत कुछ ऐसी मुझसे छिप कर गया कोई,
के अच्छे खासे दिल को खराबी दे गया कोई,

महफूज़ रखे थे जो मन के दरवाजे के भीतर मैंने,
उन एहसासों के दामन पर रंग गुलाबी दे गया कोई,

उम्मीदों की खिड़कियों की गरारी घिसने से पहले ही,
जबरन ही मेरी नज़रों को धार नवाबी दे गया कोई।।

राही (अंजाना)

Comments

3 responses to “ताला”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

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