हमारी मुफलिसी को क्या समझो तुम
तुम्हारे महल, हमारी झोपड़ी है,
हमारी राह में संघर्ष खड़ा
तुम्हारी भाग वाली खोपड़ी है।
हमें नसीब बड़ी मुश्किल से
रोटियां पेट भर को खाने को,
तुम्हारे पास फेंकने को है,
कूड़ेदानों में डालने को है।
तुम्हें तो मूल्य का पता ही नहीं
दाने-दाने में कितना जीवन है,
उसके एवज में रात-दिन खपते
तब कहीं साँस लेता जीवन है।
तुन्हें जीवन मिला है वरदानी
विधाता ने दिया है धन-पानी
उड़ाओ खूब मजे ले लो मगर
नजर बना के रखो इंसानी।