बूढ़ी थकी सी पलकों में
पल रही वो उम्मीद का जग जाना
उनके लिए पर्व का महापर्व बन जाना
वो दिवाली में मेरा घर आना
पुराने पर्दों का एकाएक नया हो जाना
धूल खा रही किताबों का
खुद से धूल हटाकर खुद से संवर जाना
रूठी खुशियों का बिन मनाए मान जाना
लंबे-लंबे देवदारों का आपस में खुशफुसाना
एक हलचल या जंगल में आग की तरह
खबर बूढे पीपल तक पहुंचाना
वह पुराने फूलों का
नई कलियों को समझाना
उस दिन तक खिल ना सको तो भी
स्वागत में बिछ जाना
उसी बूढ़ी पलकों में
जीने का नजरिया बदल जाना
पिताजी के लंबे इंतजार के बाद
वो दिवाली में बेटे का घर आना
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