दिवाली में मेरा घर आना

बूढ़ी थकी सी पलकों में
पल रही वो उम्मीद का जग जाना
उनके लिए पर्व का महापर्व बन जाना
वो दिवाली में मेरा घर आना

पुराने पर्दों का एकाएक नया हो जाना
धूल खा रही किताबों का
खुद से धूल हटाकर खुद से संवर जाना
रूठी खुशियों का बिन मनाए मान जाना

लंबे-लंबे देवदारों का आपस में खुशफुसाना
एक हलचल या जंगल में आग की तरह
खबर बूढे पीपल तक पहुंचाना

वह पुराने फूलों का
नई कलियों को समझाना
उस दिन तक खिल ना सको तो भी
स्वागत में बिछ जाना

उसी बूढ़ी पलकों में
जीने का नजरिया बदल जाना
पिताजी के लंबे इंतजार के बाद
वो दिवाली में बेटे का घर आना

Comments

4 responses to “दिवाली में मेरा घर आना”

  1. Satish Chandra Pandey

    उसी बूढ़ी पलकों में
    जीने का नजरिया बदल जाना
    पिताजी के लंबे इंतजार के बाद
    वो दिवाली में बेटे का घर आना
    — बहुत सुंदर पंक्तियाँ, बहुत सुंदर काव्य रचना

    1. Rohit

      धन्यवाद आपका

  2. बहुत सुन्दर और भावुक रचना

    1. Rohit

      आभार गीता जी

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